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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

ततः स्वप्ननरेणेव यत्किंचिद्गदितं मया । तदेतद्विद्धि वाचं त्वं पश्चान्नीतां प्रथामिह ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

इसके पश्चात्‌ स्वप्नावस्था में स्थित मनुष्य के शब्द के समान पूर्व कल्प में अभ्यस्त व्याहति, गायत्री, वेदादि जो कुछ मैंने कहा, उसीको आप इस संसार में वाणीरूप जानिये, जो पीछे वाणी नामसे प्रसिद्धि को प्राप्त हुई