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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 49

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

नास्त्येव ब्रह्मणि जगत् संवित्पश्यति तत्तथा । निर्मूलमेव संवित्त्वादेवं भ्रान्तेश्च संभ्रमम् ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी तरह ब्रह्म मे जगत्‌ नहीं है, यह बिल्कुल सही है, फिर भी बिना कारण के ही अज्ञानावृत संवित्स्वभाव से संविदात्मा वैसा उसे देखता ही है । उसका वैसा देखना वस्तुतः उसकी भ्रान्ति है । वह एकमात्र अपनी भ्रान्ति से वैसा संभ्रम को देखती है, न कि ब्रह्म में जगत्‌ को । अथवा यों कह सकते हैं कि वह ब्रह्म मेँ जगत्‌ क्या देखती है, बल्कि भ्रान्ति का संभ्रम (विलास) देखती है