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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

असदेवेदमाभाति हृद्येव जगदाततम् । संकल्पनमनोराज्यं यथा स्वप्नपुरादिवत् ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, असद्रूप ही यह जगत्‌ अन्तःकरण में ही ऐसे व्याप्त है, जैसे संकल्पप्रयुक्त मनोराज्य तथा स्वप्नकाल में निर्मित नगर आदि व्याप्त रहता है