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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verses 51–52

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verses 51–52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 51,52

संस्कृत श्लोक

पार्श्वसुप्तजनस्वप्नस्तच्चित्तावेशनं विना । यथा न किंचित्तच्चित्तावेशनादनुभूयते ॥ ५१ ॥ तथा जगत्तद्दृषदं संप्रविश्यानुभूयते । आदर्शबिम्बिताकारं दृष्टमप्यन्यथाप्यसत् ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे समीप में सोये हुए मनुष्य के स्वप्नका उसके (स्वप्नद्रष्टा के) चित्त में प्रवेश किये बिना कुछ भी अनुभव नहीं किया जा सकता, परकायप्रवेश द्वारा उसके चित्त में प्रवेश करने से तो उसका अनुभव किया जा सकता है, वैसे ही जगत्‌कल्पना के अधिष्ठानभूत चितिशिला में प्रवेश किये बिना दर्पण में प्रतिबिम्बित आकारवाले जगत्‌ का अनुभव नहीं होता, चितिशिला में प्रवेश कर उसका अनुभव होता है । दिखाई देने पर भी वह वैसा नहीं है, किन्तु असत्‌ ही है