Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
आधिभौतिकभावेन नेत्रेण यदि लक्ष्यते ।
तत्तन्न दृश्यते किंचिद्गिरिरेव प्रदृश्यते ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि आप आधिभौतिक भावमय नेत्र से देखना चाहें, तो वे शिलापर्यन्त तत्-तत् ब्रह्माण्ड
आपको तनिक भी नहीं दिखाई दे सकते, एकमात्र लोकालोक पर्वत को ही आप देख सकते
हैं