Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
सर्वत्र सर्गनिर्वाणं प्रज्ञालोकेन लक्ष्यते ।
ब्रह्मात्मैवान्यथा चेत्तन्न किंचिदभिलक्ष्यते ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वदृष्टि से यदि देखा जाय, तो सृष्टि
का निर्वाण एकमात्र ब्रह्मस्वरूप ही सर्वत्र दिखाई देता हे । इससे विपरीत रूपसे देखने पर तो
वह कुछ भी नहीं अभिलक्षित होता