Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
यथा खमावृतं सर्गैस्तथा भूरिति बुद्धवान् ।
तदाहमभवं ध्याता धराधारणयान्वितः ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ जीवन्मुक्त योगियों की द्रष्ट से देख रहे स्वयं तत््वज्ञानी श्रीकसिष्ठजी को जब आकाश
की तरह यह सारी पथिकी भी सृष्टियों से व्याप्त है“ यह बुद्धि उदित हो गध तब करमशः पथिकी
आदि एक-एक श्रुत में अहंभाव की धारणा स उन्होने जो-जो कोक अपने-आप देखा उन सवका
आगे चलकर वर्णन करने के लिए श्रमिक बोधते है/
योगदृष्टि से जब मैंने यह जान लिया कि जैसे सृष्टियों से व्याप्त आकाश है वैसे ही पृथिवी
भी अनेक सृष्ट्यां से व्याप्त है, तब पृथिवी की धारणा से युक्त मैं ध्याता होकर स्थित
हुआ