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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

तया धराधारणया धरारूपधरोऽभवम् । अत्यजन्नेव चिद्व्योमवपुः सम्राडिवाचिरात् ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे चक्रवर्ती राजा केवल स्वदेह में अहंभाव का त्याग न करता हुआ ही समस्त भूमण्डल के ऊपर ममता का भाव धारण करता है उसी तरह चिदाकाश शरीर मैं भी ब्रह्माहंभाव का परित्याग न करता हुआ ही धराहंभाव से यानी पृथ्वी मैं ही हूँ” इस तरह की पृथिवी में अहंभाव की धारणा से पृथिवीरूपधारी बन गया