Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
धराधारणया चैव धराधातूदरं गतः ।
द्वीपाद्रितृणवृक्षादिदेहोऽहमनुभूतवान् ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर हे श्रीरामचन्द्रजी, उस पृथिवी
की धारणा से पृथिवी के अभिमानी जीव की स्वरूपता प्राप्त कर द्वीप, पर्वत, तृण, वृक्षादि
की देह का मैंने अनुभव किया