Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 71
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 71 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 71
संस्कृत श्लोक
पातालेन्द्रियरन्धेषु नागासुरकृमिव्रजैः ।
सप्तस्वर्णवकोशेषु नानाजातिजलेचरैः ॥ ७१ ॥
हिन्दी अर्थ
भूतलरूप मैं पातालरूपी इन्द्रियछिद्रों में नागों तथा असुररूपी कृमिसमूहों से एवं
सात समुद्रो के अन्दर स्थित जलचरो से व्याप्त हो गया