Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 72
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 72 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 72
संस्कृत श्लोक
व्याप्तं नदीवनसमुद्रदिगन्तशैलद्वीपाख्यजन्तुविषयस्थलजङ्गलौघैः ।
नानावलीवलितमण्डलकोशखण्डं वल्लीसरःसरिदरातिगणाब्जखण्डैः ॥ ७२ ॥
हिन्दी अर्थ
(८) यहाँ से शुरू करके इस सर्ग के अन्ततक देहाधार से भूपीठ का ही वर्णन करते हैं ।
(&) यहाँ प्रकरणवश सित ओर असित घन से सूर्य और चन्द्रमा ग्रहण हे ।
(700) विशाल खन्दक के मण्डलरूप ।
अपनी कही हुईं बातों का संक्षेप से उपहार करते हुए श्रीवश्तिष्ठजी अनेक विशेषणो से
शृतलरूप अपने को विशूषित करते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, (आपसे अधिक मैं क्या कहूँ, संक्षेप में मैं आपसे यही कह देना उचित
समझता हूँ कि) भूतलरूप मैं नदी, वन, समुद्र, दिगन्त, पर्वत तथा द्वीपनामक प्राणियों के भोग्य
स्थल और जंगलों के समूहों से व्याप्त हो गया । विविध प्रकार के पर्वत, नदी आदि की पंक्तियों
तथा जनपंक्तियों से वेष्टित मण्डलकोशों के अनेक खण्ड मुझमें दिखाई देने लगे तथा लताओं,
अनेक सरोवरों, सरिताओं, शत्रुसमूहों एवं असंख्य कमलखण्डों से मैं व्याप्त हो गया