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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 88, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । भूपीठेन सता तत्र मया तदनु मानव । अनुभूतं नदनदीस्वसंवेदनसंस्थितेः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे मनुकुल में उत्पन्न श्रीरामजी, जिस तरह मैंने आपसे वर्णन किया, उस तरह मैं भूपीठरूप बन गया । उसके बाद यानी पूर्ववर्णित साधारणरूप से समस्त भूधर्मों से घटित अपनी देह को देखने के बाद नद, नदी, समुद्र आदि विशेषाकारों को जानने की इच्छा से मैंने जैसा अनुभव किया, उसे आप सुनिये

सर्ग सन्दर्भ

सत्तासीवाँ सर्ग समाप्त अड्डासीवाँ सर्ग अपने शरीररूप भूपीठपर जहाँ तहाँ विद्यमान तथा कौतुकवश आँखों से देखे गये विशेष-विशेष पदार्थों का वर्णन।