Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 88, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
शुष्कपल्लवसंकोचनिबिडाङ्गनिपीडनम् ।
अमर्षणैः करैरार्कैः स्वरसाकर्षणं क्वचित् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर इतने घने वृक्ष उगे थे कि पृथ्वी पर सूर्य अपनी किरणों
को ठीक ठीक रीति से फैला नहीं सकता था, इसलिए अपनी गति को रोकने के अपराध से करुद्ध सूर्य-
किरणों के द्वारा अपना रस खींच लेने के कारण अरण्य में सूखे पल्लव संकुचित हो गये थे और घने
अंग-प्रत्यंगों का निपीडन भी हो रहा था