Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 88, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अन्योन्यमलमाक्रम्य दिक्तटाङ्गनिपीडनैः ।
क्वचिदद्र्य स्थिनिबिडैरर्णवोल्लासवेल्लितम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर पर्वतो की शिलाओं के सदृश घनीभूत वृक्षों ने परस्पर
अत्यन्त संश्लिश्ट होकर दिशाओं के तटरूप अंगो को भर दिया था, इससे समुद्र के विलास से वेष्टित
सा सारा भूपीठ भास रहा था