Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 88, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
शाखापरिकराभोगं मृद्भागाङ्गनिपीडनैः ।
मूलजालमवष्टभ्य क्वचिद्विटपधारिणम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र,
कहीं पर वट॒वृक्षों के जंगल में पृथ्वी में शिखाओं के घुस जाने के कारण मृत्तिकाभाग के अंगो को पीडित
करनेवाले शाखासमूहों का विशालस्वरूप दीख पड़ता था, तो कहीं पर मूलजाल को पकड़कर वृक्षों
का धारण दिखाई देता था