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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, Verse 13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 88, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

क्वचिदन्तस्तु कीटास्यमृदुस्पन्दनवेदनम् । मां त्वमेवाशु बुद्ध्वेह त्रायस्वेतीव बोधनम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

कहीं पर भीतर कीटमुखों का मृदु स्पन्दन अनुभूत हो रहा था और कहींपर कीड़े, हे श्रीवसिष्ठजी, मुझे यहाँ शिला आदि के संकट में फसा हुआ जानकर आप ही मेरी रक्षा कीजिये यों जता रहे थे