Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 88, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
शीतं शीतविशीर्णाङ्गजर्जरत्वग्विकीर्णवत् ।
पाषाणीभूतसलिलं क्वचित्परुषमारुतम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर हिमालय आदि प्रदेशों में शीत से
छिन्न-भिन्न अंगोवाले जीवों की जर्जर हुई त्वचा को पूर्णरूप से व्याप्तकर स्थित था, कहींपर जलको
भी पाषाण बना रहा था और कहीं पर कठोर पवन चल रहा था