Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 88, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
उद्दालीभूतमृद्वङ्गमज्जदन्तःकृमिव्रजम् ।
क्वचिदुद्भवदङ्गादिमूलं जलनिमज्जनम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर विदलित कोमल
अंगो के भीतर कीटसमूह घुस रहा था, कहीं पर अंग आदि उत्पन्न ही हो रहे थे और कहीं जल में
मज्जन ही हो रहा है इस प्रकार मैंने अपने भूतलरूप शरीर मे अनुभव किया