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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 88, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

संविद्बोधोन्नमत्स्वाङ्गकेशोत्थाङ्कुरलोमकम् । वारिवाहनविक्षोभनतोन्नतलसत्तलम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

कहीं पर मारे हर्ष के पुलकित अपने अंग- केशों के सदृश अंकुररूपी रोम उगे हुए थे, कहीं पर जल के जबरदस्त प्रवाह से उत्पन्न विक्षोभ के कारण भूतल ऊँचा नीचा हो रहा था और इससे भला लगता था