Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 89, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
इदं भूमण्डलं तच्च द्वयमेतन्महाचितेः ।
स्वरूपमेव कचति तव स्वप्नपुरं यथा ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
विति के विवर्तभाव में धारणाकल्पित (समाधिकल्पित) श्रूमण्डल और यह ग्रव्यक्ष शूमण्डल
दोनों ही समान हैं; यह कहते हैं ।
यह प्रत्यक्ष भूमण्डल और वह धारणाकल्पित भूमण्डल-दोनों ही महाचिति के स्वरूपभूत
होकर ऐसे स्फुरित होते हैं, जैसे आपका स्वरूपभूत स्वप्ननगर होकर स्फुरित होता है