Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 89, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
स्वभावमात्रकचन तत्तदेव यथास्थितम् ।
भूमण्डलमिवात्यच्छं खमेव विशतान्तरम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रसिद्ध यह यथास्थित जगत् और वह धारणाकल्पित जगत् दोनों एकमात्र
आत्मा का स्वाभाविक स्फुरणमात्र ही है, अत्यन्त निर्मल चिदाकाश ही भेद में प्रवेश कर रहे स्वभाव
के बल से यानी मायाशबल से भूमण्डल-सा बनकर स्थित है