Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 89, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
महीतलमिवाभाति चिद्व्योमैव निरन्तरम् ।
आत्मन्येवातलं व्योम यथामलतलं स्थितम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
निरन्तर चिदाकाश ही
महीतल के सदृश भासता है, तलभावशून्य चिदाकाश ही अपने स्वरूप में स्वभावतः निर्मलतल
होकर स्थित है