Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 89, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
यतो न किंचित्कुरुते न च रूपं समुज्झति ।
तस्मान्न मानसं नेदं किंचिदस्ति महीतलम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
नेति नेति“ इत्यादि श्रुति का पर्यालोचन द्वारा उपहार करते हैं /
चूँकि चेतनरूप आत्मा न कुछ करता है और न अपना असली स्वरूप छोड़ता है, इसलिए न तो
यह मृत्पाषाणादिमय महीतल कुछ है ओर न मनोमय ही कुछ है