Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 9, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
चिद्रूपः सर्वभावानामन्तर्बहिरसि स्थितः ।
प्रसन्नाम्बुभरस्यान्तर्बहिश्चैव यथा पयः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जल स्रे पूर्ण दूध का जल नष्ट हो जाने पर भी जो रूप शेष रहता है उरी के समान दुग्हारा
अनुपम ब्रह्मरूप ही शेषरूप रहता है, यह कहते हैं /
जैसे स्वच्छ जलसमूह के बाहर और भीतर सब जगह जल-ही-जल दीखता रहता है वैसे ही
समस्त पदार्थों के बाहर और भीतर चिद्रूप से तुम्हीं स्थित दीखते हो