Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 90, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
सुप्तं पल्लवतल्पेषु प्रालेयकणरूपिणा ।
तुल्यकालमशेषेषु दिक्षु सर्वास्वखेदिना ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
जेर प्रसिद्ध जग्रत् में चॉदी की शिला आदि विभिन्न ग्रदेशों में अनेक ब्रह्ाण्डदहिकेेही
धारणाओं से देखे गये श्रूमण्ठर्लो में भी प्रत्येक कस्तु में वे जग्रत् हैं या नहीं यों सन्देह कर रहे
श्रीरामचन्द्र यह प्रश्न करते हैं /
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, इसके बाद मुझसे यह कहिए कि जैसे प्रसिद्ध जगत् की वस्तुओं
में प्रत्येक में आपने अनेक जगत् देखे वैसे ही आपने धारणाभ्यास से जिस महीपीठ को देखा उसके
विविध प्रदेशों के भीतर भी आपने कहीं जगत् देखे या नहीं
सर्ग सन्दर्भ
नवासीवाँ सर्ग समाप्त नत्वेवों सर्म पृथ्वी के अन्दर अनन्त जगतों की दृष्टि तथा जलधारणा से समस्त जललीलाओं का पूर्ववत् वर्णन।