Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 89, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रमेतदजरं परमात्मतत्त्वं शुद्धात्मतामजहदङ्गगतं बिभर्ति ।
सर्वं यथास्थितमिदं जगदात्तभेदं बुद्धं सदङ्ग न बिभर्ति तु किंचनापि ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, चिन्मात्ररूप,
जरावस्था से शून्य यह परमात्मतत्त्व ही अबोधकाल में अपनी शुद्धरूपता का परित्याग न करके ही
यथास्थित इस समस्त जगत् को मानों सद्रूप बनाकर धारण करता है, ज्ञान हो जाने पर तो वह कुछ
भी धारण नहीं करता, यही इसकी मुक्ति है