Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 90, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
जगतां तत्र लक्षाणि नाशोत्पातशतानि च ।
मया दृष्टानि रूढानि कदलीदलपीठवत् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
हर एक वस्तु के अन्दर जो जयत् देखे उनके भी भीतर के प्रत्येक पदार्थ में वैसे ही अन्य अन्य
अव्यवस्थित जयत् भीतर भीतर मैने देखे, यह कहते हैं ।
भद्र, वहाँ केले के दल के सदृश भीतर और उसके भी भीतर उत्पन्न लाखों जगत् तथा सैकड़ों
नाश एवं उत्पात मैंने देखे