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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

हेमादिषु सुवर्णत्वं नरादिषु पराक्रमः । काचकच्यं च रत्नादौ वर्षादिष्ववभासनम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, मैं तेज बनकर सुवर्णादि में सुन्दर वर्ण (रंग) बन गया, मनुष्यादि में पराक्रम बन गया, रत्न आदि में चाकचाक्य (कान्तिविशेष) बन गया ओर वर्षा ऋतु में विद्युत-प्रकाश (बिजली की चमक) बन गया