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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verses 15–16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verses 15–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 15,16

संस्कृत श्लोक

नभस्तलगतासंख्यनक्षत्रमणिमालितः । दिनर्तुवत्सराबृंह्यवाडवाग्न्यादिफेनिलः ॥ १५ ॥ चन्द्रार्कादितरङ्गान्तरजडं पङ्किलो महान् । बृहद्ब्रह्माण्डखातस्थो नित्यमेकार्णवोऽक्षयः ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

यह तेज विशाल ब्रह्मांड के खन्दक में रहनेवाला बड़ा समुद्र ही हैं, यों उत्प्रेक्षा करने के लिए रूपक से कल्पित धर्मो से तेज को विशेषित करते हैं / यह तेज विशाल ब्रह्माण्ड के खण्ड का एक महान्‌ अविनाशी समुद्र है । आकाशतल में विद्यमान असंख्य नक्षत्ररूपी मणियों से भरा है, इसमें दिन, ऋतु, संवत्सर आदि कालभेदरूप चारों ओर वृद्धिगत बडवाग्नि आदि से उत्पन्न महान्‌ क्षोभ के कारण फेन उत्पन्न होता है । चन्द्र, सूर्य आदिरूप तरगों के भीतर प्रसृत रज से जल के बिना कभी कीचड़ भी इसमें भरा रहता है