Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
तृणीकृतत्रिभुवनचपेटास्फोटितद्विषाम् ।
शिरःसु वज्रीकरणं वीर्यं सिंहादिचेतसि ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, तेज की धारणा से तेज होकर में
वृत्र आदि असुरो के, जो त्रिभुवनको तृण के समान समझते थे तथा अपनी चेष्टाओं से अपने शत्रुओं
को कँपा डालते थे, मस्तक पर वलप्रहार बन गया ओर सिंह आदि के हृदय में वीर्यरूप बन
गया