Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
पादाहतिं गतं मार्गे तिलकत्वं वधूमुखे ।
खद्योतेन मया लब्धं पश्यावस्थासु चापलम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
खद्योत बनकर जो अनुभव किया, उसे कहते हैं ।
खद्योत बनकर मैंने मार्ग मे गमन कर रहे मनुष्यों के पैरों से खूब रगड़ खाने का अनुभव किया
और स्त्रियों के ललाटपर तिलकरूपता का भी अनुभव किया । स्थानभेदों से प्राप्त हुई
उत्कर्षअपकर्षरूप अवस्थाओं में मेरी चपलता (अनियतता) तो जरा देखिये