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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

लोकालोके च हृषितैश्चन्द्रार्काद्यंशुरोमभिः । परप्रकाशैकरतैर्दूरोत्क्षिप्ताम्बराम्बरम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

मैंने तेजरूप बनकर केवल दूसरों के प्रकाश के प्रकाशन में ही तत्पर रहनेवाले, अतएव जनों एवं भुवनो में अतिसन्तुष्ट तथा पुलकित रहने वाले चन्द्र, सूर्यं की किरणरूपी अपने रोमां के द्वारा सबको ढक देने वाले अन्धकार रूप वस्त्र के सदृश दुश्यमान आकाशरूप वस्त्र को उठाकर दूर फेंक दिया