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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यथा याति नरः सुप्तो जडतां चेतनोऽपि सन् । चिद्व्योम गच्छेद्दृश्यत्वं तथा जाड्यं प्रचेतति ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

विदानन्दैकरसस्वरूप ब्रह्मक्रत मैने केवल कोंठुकवश जयद्वपता का आरोप देखा था, इसलिए उक्त पाषाण, मणि आदि अवस्थाओं में मुझको तनिक भी दुःख नहीं हुआ, किन्तु छख ही हुआ, यों उत्तर देने के लिए वस्तिष्ठजी भूमिका बोधते हैं / श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, जैसे सुप्त पुरुष चेतनरूप होता हुआ भी जडता का अनुभव करता है, वैसे ही चिद्रूप आकाश दृश्यभाव को प्राप्त होकर जडता का अनुभव करता है