Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
वस्तुतस्तस्य खोर्व्यादि नासद्रूपं न सन्मयम् ।
द्रष्टृदृश्यमिवाभाति ब्रह्म चैतत्समं स्थितम् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
क्यों ब्रह्म का अन्यथाभाव नहीं होता 2 इस आशंका पर कहते हैं /
ब्रह्म में जो आकाश, पृथ्वी आदि स्वरूप भासते हैं, वे वास्तव में ब्रह्म के सद् या असदात्मक
स्वरूप नहीं हैं, किन्तु यों ही द्रष्टा-दृश्य से वे भासते हैं, इसलिए ब्रह्म तो सदा ही एक-सा यानी
अविकृत ही अवस्थित है