Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
एतत्सत्यपरिज्ञानं यस्योत्पन्नमखण्डितम् ।
न तस्य पञ्चभूतानि न दृश्यद्रष्टृविभ्रमः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्नान होने पर ही दुःख आता हैं, किन्तु वह नहीं हैं, यह कहते हैं /
भद्र, जिस पुरुष को यह सच्चिदानन्दात्मक अखण्ड ब्रह्मज्ञान उत्पन्न हो गया है, उसकी
दृष्टि में न तो पाँच भूत ही हैं और न उसे दृश्य-द्रष्टा का विभ्रम ही भासता है