Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
सुप्तोऽस्मीति दृढं भावं बुद्धवांश्चेतनोऽपि सन् ।
नैद्रमेवैत्यलं जाड्यं लसच्चेतति किंचन ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
तब चुष्ञप्ति अवस्था में मैंने कुछ नहीं जाना यह ज्ञान के अभाव का अनुभव केसे होता है ? इस
पर कहते हैं /
मैं सोया हूँ” इस दृढ़ भाव को चेतन होकर भी मैंने जाना, उस दशा में निद्रादोष से
उपस्थित किया गया अज्ञान ही भने कुछ नहीं जाना" इस प्रतीति से प्राप्त करायी गयी जडता
धारण करता है ओर प्रकाशमान स्वप्रकाशरूप जो वस्तु है, वह तो उस समय प्रकाशती और
अनुभव करती रहती है, यदि यह बात न होती तो सुषुप्तिकाल में अनुभूत अज्ञान का
जाग्रतकाल में स्मरण कैसे होता ?