Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
यदा पुनरहं पञ्चभूतानीत्येव भासयन् ।
भवामि जड एवाहं तदा चेतामि किं किल ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि पाषाण मणि आदि का रुप होने पर मुझमें चैतन्य न रहता, तो उनका अनुभव और स्मरण
आज मुझको होता ही नहीं; इस आशय से कहते हैं ।
श्रीरामजी, पृथ्वी आदि की धारणाओं द्वारा अपने को पृथ्वी आदि पाँच भूतों के रूप में
प्रकाशित कर रहा मैं यदि जड़ रूप ही बन जाता, तो मैं उनका अनुभव ही कैसे कर सकता ?