Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
बोधदेहेन हृदयं शिलानामप्यभेदिनाम् ।
प्रविश्याशु विनिर्याति याति पातालमम्बरम् ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
बोधरूप देह के प्रभाव से अभेद्य पाषाण शिलाओं के भी भीतर
प्रवेश करके पुरुष अनायास बाहर निकल जाता है, पाताल में चला जाता है और आकाशमण्डल
में भी विचरता है