Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रव्योमरूपोऽस्मीत्यर्कादाविति बोधतः ।
आत्मैवास्तमुपानीतः सन्नेवासन्निवात्मना ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
इच्छा से ही तत्वज्ञ पुरुष सूयि समस्त जगत् को विलीन करके आत्ममात्रस्वरूप से स्थापित
कर सकते है यह कहते हैं /
इस तरह सूर्य आदि लोकों में “चिन्मात्र स्वरूप आकाशरूप मैं ही हूँ,” इस बोध से अपनी
आत्मा के असली स्वरूप से ज्ञात होता हुआ भी सूर्यादिलोक जगत् के बोध से असत्-सा तथा
अस्तको प्राप्त-सा हो जाता है यानी तत्त्वज्ञ लोग सूर्य आदि समस्त जगत् को जगद्रूप से असत्
बनाकर आत्मरूप से स्थापित कर लेते हैं, यह तात्पर्य ह