Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
कज्जलालिकया वह्निविपिनं पुष्पशोभया ।
फुल्लस्थलाम्बुजाकारं किंशुकाशोकरूपया ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
यो श्रीरामभद्र के प्रश्न का उत्तर देकर अब प्रस्तुत विषयपर आकर श्रीवकिष्टकी कहते है /
भद्र, इस तरह अग्निरूपधारी मेने काजलरूपी भ्रमरो के समूहों से समन्वित एवं अशोकरूप
फूलों की शोभा से युक्त प्रदीप्त ज्वालाओं के कारण अग्नि से व्याप्त जंगल को विकसित स्थलकमल
के सदृश बना दिया