Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 91, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
विततारम्भयाप्युच्चैर्ज्वालाज्वलतयेद्धया ।
उपोत्थायाङ्ग गलितं खललक्ष्म्येव लीलया ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रिय, दुष्ट पुरुष की लक्ष्मी के सदृश बढ़ी हुई तथा घटाटोपपूर्ण
चंचल ऊँची ऊँची ज्वालामालाओं के रूप से तत्काल ही उत्कर्ष प्राप्त कर मैँ सहसा नष्ट भी हो
गया