Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
आकाशकुसुमामोदः सर्वशब्दसहोदरः ।
नाडीप्रणालीसलिलं भूताङ्गोपाङ्गवर्तकः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाशरूपी फूल की मैं सुगन्ध था, इसीलिए आकाश के गुण सब
शब्दों का भ सहोदर भाई भी बन गया तथा प्राणियों के अंग उपागों मेँ प्रवर्तक बनकर उनकी
नाडीरूप प्रणालियों मे जलरूप-सा भी हो गया