Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
शरीरावेष्टितोन्मुक्तपुराणतृणचोपनः ।
स्पन्दपद्मवनादित्यः शब्दवर्षैकवारिदः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
झंझावातरूप शरीर के वेष्टन से निर्मुक्त जीर्ण -शीर्ण तृणों में मे मन्द मन्द गति
देता था, स्पन्दरूप (सामान्य क्रियारूप) कमलवनका मैं आदित्य यानी विकास का हेतु था और
शब्दरूप वृष्टि के लिए मैं मुख्य मेघ था