Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
शरीरनगरीनाशनिर्माणैकपरायणः ।
रसकिट्टकलाधातुपृथक्करणकोविदः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
शरीररूपी नगरों के नाश और निर्माण में अकेला मैं तत्पर रहता था । अन्नरसों
के मल, सूक्ष्मतर सारभागरूप त्वचा आदि छः कलाओं एवं वात-पित्त-कफरूप धातुओं के पृथक्करण
में मे महापण्डित था