Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
प्रतिसूक्ष्माणुकं देहे ततो दृष्टं मया जगत् ।
तत्रेत्थं रूपवानस्मि स्फुटमाभोगि सुस्थिरम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर वायुमण्डल में भी परमाणु तक के एक-एक द्रव्य के अन्दर
भी मैंने रजत की शिला के सदृश सुस्थिर, अतिविशाल जगत् देखे । उन जगतां मे भी इसी तरह
पृथ्वी आदि जगत् के रूप में मैं ही रहा