Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
परमाणुप्रति त्वत्र प्रोह्यन्त इव सर्गकाः ।
न च किंचित्किलोह्यन्ते स्वा कृते किमिवोह्यते ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि यहाँ प्रत्येक परमाणु में अनेक सृष्टियाँ बहती
हुई-सी प्रतीत होती हैं, तथापि परमार्थ दृष्टि से विचारने पर न तो कुछ है, न कोई बहती-सी हैं,
क्योकि शून्याकार ब्रह्म मेँ बहना ही क्या ?