Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
रसः पीतोऽनुभूतश्च क्ष्माजलानिलतेजसाम् ।
मूलजालेन वृक्षाणां प्राणिनां वसता मया ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
जेते जेते विहार किया; उसका विस्तार के साथ वर्णन करते हैं /
भद्र, पृथ्वी, जल, वायु, ओर तेज के समूहरूप वृक्षों के शरीर में निवास करते हुए मैंने
मूलजाल के द्वारा पृथ्वी का रस पीया और उसका प्रचुर अनुभव (स्वाद) लिया