Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
रसायनघनाङ्गेषु चन्दनद्रवशोभिषु ।
लुठितं चन्द्रबिम्बेषु तुषारशयनेष्विव ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
अमृत से
पूर्णं (घनीभूत) अंगोंवाले तथा चन्दन के द्रव के समान शीतत्व आदि गुणों से सुशोभित चन्द्रविम्बोपर,
जो तुषार की शय्याओं-जैसे थे, खूब लोटपोट ली