Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
दिक्षु सर्वासु सर्वत्र सर्वदा सर्वकारिणा ।
सर्वात्मनाप्यसर्वेण शून्यरूपेण संस्थितम् ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि मैं समस्त दिशाओं में, सभी स्थलों में, सभी कालों में
सर्वात्मा बनकर सब कुछ व्यवहार उस समय कर रहा था, फिर भी असल में असर्वात्मक एक एवं
समस्त द्वैत पदार्थों से शून्य चिन्मात्र स्वरूप से स्थित था