Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
सर्वपातालपादेन भूतलोदरधारिणा ।
स्वमूर्ध्नापि तदा राम न त्यक्ताथ पराणुता ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
यों यद्यपि मैं अतिविस्तृत ब्ह्माण्डरुप था, तथापि मैने परम सूक्ष्म विन्मात्र स्वभावता का
परित्याय नहीं किया, यह कहते हैं ।
हे श्रीरामजी, ब्रह्माण्डस्वरूप-दशा में यद्यपि समस्त पाताल मेरे चरण बन गये थे, भूतल मेरा
उदर बन गया था और आकाश मेरा मस्तक हो गया था, फिर भी मैंने अपनी चितिमात्रस्वभावरूप
सूक्ष्मता कभी नहीं छोड़ी